डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की प्रेरणादायक जीवन कहानी

 

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की प्रेरणादायक जीवन कहानी

एक गरीब मछुआरे के बेटे से भारत के सबसे बड़े सपने देखने वाले इंसान बनने तक

"सपने वो नहीं होते जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वो होते हैं जो हमें सोने नहीं देते।"

ये शब्द केवल एक महान वैज्ञानिक के नहीं थे, बल्कि उस इंसान के थे जिसने गरीबी, संघर्ष और असफलताओं को अपनी ताकत बनाकर करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा की मिसाल कायम की। यह कहानी है भारत के "मिसाइल मैन" और "जनता के राष्ट्रपति" डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की।

जब भी भारत के सबसे प्रेरणादायक व्यक्तियों की बात होती है, तो एक नाम हर भारतीय के दिल में सबसे पहले आता है—डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम। उन्हें लोग "मिसाइल मैन ऑफ इंडिया", "पीपुल्स प्रेसिडेंट" और "भारत रत्न" जैसे सम्मानित नामों से जानते हैं। लेकिन इन सभी उपाधियों से पहले वे एक ऐसे इंसान थे जिसने गरीबी देखी, संघर्ष देखा, असफलता देखी और फिर भी कभी अपने सपनों से समझौता नहीं किया।

उनकी कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है, लेकिन यह पूरी तरह सच्ची है। यह कहानी केवल एक वैज्ञानिक या राष्ट्रपति की नहीं है, बल्कि उस बच्चे की है जिसने अपनी मेहनत से करोड़ों युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि जन्म की परिस्थितियाँ इंसान का भविष्य तय नहीं करतीं।

समुद्र किनारे बसे छोटे से द्वीप में जन्म

15 अक्टूबर 1931 की सुबह तमिलनाडु के रामेश्वरम द्वीप पर एक साधारण से घर में एक बच्चे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम

रामेश्वरम उस समय एक छोटा-सा धार्मिक नगर था, जहाँ देशभर से श्रद्धालु भगवान रामनाथस्वामी मंदिर के दर्शन करने आते थे। समुद्र से घिरा यह इलाका प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर था, लेकिन यहाँ रहने वाले अधिकांश लोग साधारण जीवन जीते थे।

कलाम के पिता जैनुलाब्दीन नाव चलाने का काम करते थे। वे तीर्थयात्रियों को नाव से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाते थे। उनकी माता आशियम्मा अत्यंत दयालु और धार्मिक स्वभाव की महिला थीं। वे घर आने वाले किसी भी भूखे व्यक्ति को बिना भोजन कराए वापस नहीं भेजती थीं।

परिवार में धन की कमी थी, लेकिन संस्कारों की कोई कमी नहीं थी। उनके माता-पिता ने उन्हें बचपन से ही तीन बातें सिखाईं—ईमानदारी, मेहनत और दूसरों की मदद करना।

यही तीन सिद्धांत आगे चलकर उनके पूरे जीवन की पहचान बने।

गरीबी ने बचपन छीन लिया, लेकिन सपने नहीं

जब कलाम बहुत छोटे थे, तब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई। पहले जो नाव का व्यवसाय ठीक चलता था, समय के साथ उसमें गिरावट आने लगी। घर का खर्च चलाना मुश्किल होने लगा।

ऐसी स्थिति में अधिकांश बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं, लेकिन अब्दुल कलाम ने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने निर्णय लिया कि वे पढ़ाई भी करेंगे और परिवार की मदद भी करेंगे।

यहीं से शुरू हुआ उनके संघर्ष का पहला अध्याय।

सुबह अखबार बेचने वाला वह छोटा लड़का

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रेलवे व्यवस्था बदल गई थी। रामेश्वरम स्टेशन पर ट्रेनें कम रुकती थीं। अखबारों के बंडल चलती ट्रेन से फेंक दिए जाते थे।

हर सुबह सूरज निकलने से पहले एक छोटा-सा दुबला-पतला लड़का स्टेशन पहुँच जाता था।

वह दौड़कर अखबारों के बंडल उठाता, उन्हें अलग करता और पूरे शहर में घर-घर जाकर बेचता।

वह लड़का कोई और नहीं, बल्कि अब्दुल कलाम थे।

अखबार बेचने से जो थोड़े पैसे मिलते, वे सीधे अपनी माँ के हाथ में रख देते।

उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि यह काम छोटा है। वे मानते थे कि मेहनत से किया गया कोई भी काम छोटा नहीं होता।

शायद यही कारण था कि जीवन में इतना बड़ा बनने के बाद भी उनके अंदर कभी अहंकार नहीं आया।

स्कूल में एक साधारण विद्यार्थी

बहुत से लोग सोचते हैं कि अब्दुल कलाम बचपन से ही असाधारण छात्र रहे होंगे।

लेकिन सच इससे अलग था।

वे स्कूल में सामान्य अंक लाते थे।

हाँ, एक चीज़ उन्हें बाकी बच्चों से अलग बनाती थी—उनकी जिज्ञासा।

वे हर बात जानना चाहते थे।

आसमान नीला क्यों है?

पक्षी उड़ते कैसे हैं?

बारिश कैसे होती है?

रॉकेट ऊपर कैसे जाता है?

उनके पास प्रश्न ही प्रश्न होते थे।

कई बार शिक्षक भी उनकी जिज्ञासा देखकर मुस्कुरा देते थे।

जिसने उनकी जिंदगी बदल दी

उनके विज्ञान शिक्षक शिवसुब्रमण्यम अय्यर केवल किताबों से पढ़ाने में विश्वास नहीं रखते थे।

एक दिन उन्होंने कक्षा में पक्षियों की उड़ान पढ़ाई।

लेकिन उन्हें लगा कि बच्चे केवल किताब से यह बात नहीं समझ पाएँगे।

अगले दिन वे पूरी कक्षा को समुद्र किनारे ले गए।

उन्होंने बच्चों से कहा—

"आसमान की तरफ देखो।"

सैकड़ों पक्षी उड़ रहे थे।

उन्होंने समझाया कि पक्षी कैसे अपने पंखों का संतुलन बनाते हैं, हवा का उपयोग करते हैं और ऊँचाई प्राप्त करते हैं।

छोटे अब्दुल कलाम उन पक्षियों को लगातार देखते रहे।

उस दिन उनके मन में एक सपना जन्मा।

उन्होंने सोचा—

"एक दिन मैं भी ऐसी मशीन बनाऊँगा जो आसमान में उड़ सके।"

शायद उन्हें भी उस समय नहीं पता था कि आगे चलकर वही बच्चा भारत के रॉकेट कार्यक्रम का नेतृत्व करेगा।

धर्म से पहले इंसानियत

रामेश्वरम धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था।

कलाम मुस्लिम परिवार से थे।

लेकिन उनके सबसे अच्छे मित्रों में हिन्दू बच्चे भी थे।

उनके पिता मस्जिद के इमाम थे।

उनके मित्र के पिता मंदिर के मुख्य पुजारी थे।

दोनों परिवारों में गहरा सम्मान था।

शाम को अक्सर मस्जिद के इमाम, मंदिर के पुजारी और चर्च के पादरी एक साथ बैठकर चाय पीते और समाज की समस्याओं पर चर्चा करते।

छोटे कलाम यह सब देखते थे।

उन्होंने वहीं से सीखा—

धर्म इंसानों को जोड़ने के लिए होता है, बाँटने के लिए नहीं।

इसी कारण राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे कुरान के साथ-साथ भगवद्गीता का अध्ययन करते थे।

माँ का त्याग

अब्दुल कलाम अपनी माँ से बहुत प्रेम करते थे।

वे बाद में अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि कई बार घर में खाना कम होता था।

माँ स्वयं भूखी रह जातीं लेकिन बच्चों को पूरा खाना खिलाती थीं।

एक दिन कलाम ने देखा कि उनकी माँ ने अपनी रोटी भी उन्हें दे दी है।

उन्हें बहुत दुख हुआ।

उसी दिन उन्होंने तय किया—

"मैं बड़ा होकर ऐसा जीवन जीऊँगा कि मेरी माँ को कभी तकलीफ न हो।"

माँ का यह त्याग उन्हें जीवनभर याद रहा।

लालटेन की रोशनी में पढ़ाई

आज के समय में बच्चों के पास बिजली, इंटरनेट, मोबाइल और कंप्यूटर हैं।

लेकिन उस समय ऐसा कुछ नहीं था।

रात को घर में केवल एक लालटेन जलती थी।

उसी की रोशनी में अब्दुल कलाम घंटों पढ़ाई करते थे।

जब बाकी बच्चे सो जाते, तब भी वे गणित के सवाल हल करते रहते।

उनकी माँ कई बार कहतीं—

"अब सो जाओ बेटा।"

लेकिन वे मुस्कुराकर कहते—

"बस थोड़ा और पढ़ लूँ।"

यही "थोड़ा और" उन्हें दुनिया के महान वैज्ञानिकों में शामिल कर गया।

कॉलेज की ओर पहला कदम

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सेंट जोसेफ कॉलेज से भौतिक विज्ञान में स्नातक किया।

लेकिन उनका सपना इससे भी बड़ा था।

वे विमान बनाना चाहते थे।

उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया।

समस्या यह थी कि कॉलेज की फीस बहुत अधिक थी।

परिवार के पास पैसे नहीं थे।

तब उनकी बहन ने अपने गहने गिरवी रख दिए ताकि उनके छोटे भाई की पढ़ाई रुक न जाए।

कलाम जीवनभर इस त्याग को नहीं भूले।

वे हमेशा कहते थे—

"यदि मेरी बहन उस समय मेरा साथ न देती, तो शायद मैं इंजीनियर कभी नहीं बन पाता।"

तीन दिन जिन्होंने जिंदगी बदल दी

कॉलेज में पढ़ाई के दौरान एक दिन उनके प्रोफेसर ने विमान का मॉडल बनाने का प्रोजेक्ट दिया।

समय बीत गया।

प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ।

प्रोफेसर बहुत नाराज़ हुए।

उन्होंने कहा—

"यदि तीन दिनों के भीतर यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं किया, तो तुम्हारी छात्रवृत्ति समाप्त कर दी जाएगी।"

यह सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

छात्रवृत्ति चली जाती तो पढ़ाई भी छूट जाती।

उन्होंने अगले तीन दिन और तीन रात लगभग बिना सोए काम किया।

आखिरकार समय सीमा से पहले प्रोजेक्ट पूरा हो गया।

प्रोफेसर ने मॉडल देखा और कहा—

"मैं जानता था कि तुम्हारे अंदर यह क्षमता है। मुझे केवल उसे बाहर लाना था।"

उस दिन कलाम ने सीखा—

दबाव इंसान को तोड़ता नहीं, बल्कि उसकी छिपी हुई क्षमता को बाहर निकालता है।

एक सपना टूटा...

इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद उनका सबसे बड़ा सपना था—

भारतीय वायु सेना में फाइटर पायलट बनना।

उन्होंने परीक्षा दी।

साक्षात्कार भी अच्छा हुआ।

परिणाम आया।

वे नौवें स्थान पर थे।

लेकिन चयन केवल आठ उम्मीदवारों का होना था।

उनका सपना टूट गया।

वे बहुत निराश हुए।

उन्हें लगा कि अब जीवन में कुछ नहीं बचा।

लेकिन शायद भगवान ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था...


असफलता से सफलता तक – जब एक वैज्ञानिक ने भारत को नई उड़ान दी

फाइटर पायलट बनने का सपना टूट चुका था। परिणाम की सूची में उनका नाम नौवें स्थान पर था, जबकि केवल आठ उम्मीदवारों का चयन होना था। यह उनके जीवन का सबसे कठिन समय था। वर्षों से जिस सपने को उन्होंने अपने दिल में संजोकर रखा था, वह एक ही पल में बिखर गया।

कई लोग ऐसी असफलता के बाद अपने सपनों को छोड़ देते हैं, लेकिन अब्दुल कलाम ने ऐसा नहीं किया। वे कुछ दिनों तक बहुत निराश रहे। इसी दौरान उनकी मुलाकात उत्तराखंड के ऋषिकेश में प्रसिद्ध संत स्वामी शिवानंद से हुई। उन्होंने कलाम के चेहरे पर निराशा देखी और मुस्कुराते हुए कहा, "जो हुआ है, उसे स्वीकार करो। ईश्वर ने तुम्हारे लिए इससे भी बड़ा कार्य निर्धारित किया है। अपने जीवन का उद्देश्य खोजो, सफलता स्वयं तुम्हारे पास आएगी।"

ये शब्द उनके मन में हमेशा के लिए बस गए। उन्होंने अपने टूटे हुए सपने को अलविदा कहा और एक नए लक्ष्य के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया।

DRDO में पहला कदम

सन् 1960 में इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद अब्दुल कलाम ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) में वैज्ञानिक के रूप में काम शुरू किया। उनका पहला कार्य एक छोटे हॉवरक्राफ्ट (Hovercraft) का डिज़ाइन तैयार करना था। उन्होंने पूरी लगन से काम किया, लेकिन उनके मन को संतोष नहीं मिल रहा था। उन्हें लगता था कि वे इससे भी बड़ा काम कर सकते हैं।

उन्हें हमेशा आसमान की ओर देखने की आदत थी। वे रॉकेट और अंतरिक्ष विज्ञान में काम करना चाहते थे। शायद किस्मत भी उन्हें उसी दिशा में ले जाना चाहती थी।

जब ISRO ने बदल दी किस्मत

कुछ वर्षों बाद उन्हें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में काम करने का अवसर मिला। उस समय भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत कर रहा था। संसाधन बहुत कम थे। आधुनिक प्रयोगशालाएँ नहीं थीं। वैज्ञानिकों के पास महंगे उपकरण भी नहीं थे।

कई बार रॉकेट के हिस्से साइकिल और बैलगाड़ी पर रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाए जाते थे। जिस देश के पास सीमित संसाधन थे, वही देश अंतरिक्ष में अपनी पहचान बनाने का सपना देख रहा था।

अब्दुल कलाम इस सपने का हिस्सा बन चुके थे।

डॉ. विक्रम साराभाई से मिली सबसे बड़ी प्रेरणा

ISRO में काम करते समय उन्हें भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई के साथ काम करने का अवसर मिला। साराभाई केवल एक वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि ऐसे दूरदर्शी नेता थे जो अपने साथ काम करने वाले हर युवा वैज्ञानिक पर भरोसा करते थे।

वे अक्सर कहते थे—

"यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो विज्ञान और तकनीक को गाँव-गाँव तक पहुँचाना होगा।"

कलाम ने उनसे केवल विज्ञान नहीं सीखा, बल्कि यह भी सीखा कि एक महान नेता अपनी टीम पर विश्वास करता है और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देता है।

भारत का पहला रॉकेट मिशन

कई वर्षों की मेहनत के बाद भारत ने अपना पहला स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV-3) तैयार किया। इस परियोजना के निदेशक थे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम।

18 जुलाई 1980 का दिन भारतीय विज्ञान के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया, लेकिन उससे पहले एक बहुत बड़ी परीक्षा बाकी थी।

पहली बड़ी असफलता

सन् 1979 में SLV-3 का पहला प्रक्षेपण किया गया। पूरे देश की निगाहें इस मिशन पर थीं। वैज्ञानिकों ने वर्षों की मेहनत इस परियोजना में लगाई थी।

काउंटडाउन शुरू हुआ...

रॉकेट आसमान में उठा...

कुछ सेकंड तक सब कुछ सामान्य रहा...

लेकिन अचानक तकनीकी खराबी आ गई और रॉकेट अपने निर्धारित मार्ग से भटक गया।

कुछ ही क्षणों बाद पूरा मिशन असफल हो गया।

रॉकेट समुद्र में गिर गया।

पूरे देश में निराशा फैल गई। समाचार पत्रों ने इसे भारत की असफलता बताया। कई लोगों ने वैज्ञानिकों की आलोचना शुरू कर दी।

डॉ. कलाम पूरी तरह टूट चुके थे। उन्हें लगा कि उन्होंने देश को निराश कर दिया।

सतीश धवन से सीखा नेतृत्व

अगले दिन मीडिया के सामने जाने का समय आया।

अब्दुल कलाम सोच रहे थे कि अब उन्हें पूरी दुनिया के सामने जवाब देना होगा।

लेकिन तभी ISRO के अध्यक्ष प्रो. सतीश धवन ने कहा—

"आज प्रेस कॉन्फ्रेंस मैं करूँगा।"

वे पत्रकारों के सामने गए और बोले—

"यह मिशन असफल हुआ है, इसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी है। हमारी टीम ने पूरी मेहनत की है। हम अपनी गलतियों से सीखेंगे और अगले वर्ष सफल होकर लौटेंगे।"

उन्होंने एक भी बार अपनी टीम को दोष नहीं दिया।

पूरे देश ने उनकी बात सुनी।

टीम का मनोबल टूटने से बच गया।

एक साल बाद...

वैज्ञानिकों ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

हर छोटी गलती को सुधारा गया।

हर परीक्षण दोबारा किया गया।

फिर आया 18 जुलाई 1980

एक बार फिर काउंटडाउन शुरू हुआ।

रॉकेट ने उड़ान भरी।

इस बार सब कुछ सही रहा।

कुछ ही देर बाद रोहिणी उपग्रह सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो गया।

भारत अंतरिक्ष क्लब में शामिल हो चुका था।

पूरा देश खुशी से झूम उठा।

लेकिन इस बार प्रो. सतीश धवन ने कुछ ऐसा किया जिसने डॉ. कलाम को जीवनभर के लिए बदल दिया।

उन्होंने कहा—

"आज प्रेस कॉन्फ्रेंस मैं नहीं करूँगा। आज दुनिया को सफलता की कहानी हमारी टीम सुनाएगी। कलाम, आप जाइए।"

कलाम बाद में कहा करते थे—

"उस दिन मैंने नेतृत्व का सबसे बड़ा पाठ सीखा। महान नेता असफलता की जिम्मेदारी स्वयं लेते हैं और सफलता का श्रेय अपनी टीम को देते हैं।"

मिसाइल मैन ऑफ इंडिया

ISRO में सफलता के बाद उन्हें फिर DRDO बुलाया गया। इस बार उद्देश्य था—भारत को आधुनिक मिसाइल तकनीक में आत्मनिर्भर बनाना।

उन्होंने इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) का नेतृत्व किया।

इसी कार्यक्रम के अंतर्गत भारत ने कई महत्वपूर्ण मिसाइलें विकसित कीं—

  • पृथ्वी

  • अग्नि

  • आकाश

  • नाग

  • त्रिशूल

इन परियोजनाओं ने भारत की रक्षा क्षमता को पूरी तरह बदल दिया।

देश-विदेश के वैज्ञानिक उनके कार्य से प्रभावित हुए।

धीरे-धीरे पूरा देश उन्हें "मिसाइल मैन ऑफ इंडिया" कहने लगा।

पोखरण परमाणु परीक्षण

सन् 1998 में भारत ने राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण करने का निर्णय लिया।

यह मिशन पूरी तरह गोपनीय रखा गया।

अमेरिका सहित कई देशों के जासूसी उपग्रह भारत पर नजर रख रहे थे।

इसलिए वैज्ञानिक दिन में सामान्य कपड़ों में घूमते और रात में परीक्षण की तैयारी करते।

डॉ. अब्दुल कलाम ने इस मिशन के वैज्ञानिक समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

11 मई और 13 मई 1998 को भारत ने सफल परमाणु परीक्षण किए।

पूरी दुनिया हैरान रह गई।

भारत ने दुनिया को दिखा दिया कि वह विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में किसी से कम नहीं है।

सम्मानों की बारिश

उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें अनेक सम्मान दिए।

1981 में पद्म भूषण

1990 में पद्म विभूषण

और 1997 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न

लेकिन इन पुरस्कारों के बाद भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया।

वे आज भी उतने ही सरल थे जितने रामेश्वरम के दिनों में थे।

राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव

सन् 2002 में जब भारत के नए राष्ट्रपति के नाम पर चर्चा हो रही थी, तब सभी राजनीतिक दलों की नजर एक ऐसे व्यक्ति पर गई जो राजनीति से नहीं, बल्कि विज्ञान, शिक्षा और ईमानदारी से जुड़ा था।

वह नाम था—

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम।

उन्होंने कभी चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं जताई थी।

लेकिन देश चाहता था कि ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति बने जो बच्चों का प्रिय हो, ईमानदार हो और भारत के भविष्य का सपना देखता हो।

25 जुलाई 2002 को उन्होंने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।

राष्ट्रपति भवन में पहली बार एक वैज्ञानिक पहुँचा था।

लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे पहले जैसे ही रहे।

न कोई अहंकार।

न कोई दिखावा।

न कोई विशेष जीवनशैली।

उनका सबसे प्रिय कार्य था—देशभर के छात्रों से मिलना।

वे कहते थे—

"यदि किसी राष्ट्र को विकसित बनाना है, तो उसके युवाओं को बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करना होगा।"

यही कारण था कि पूरे देश ने उन्हें प्रेम से "पीपुल्स प्रेसिडेंट" यानी "जनता का राष्ट्रपति" कहना शुरू कर दिया।

लेकिन उनकी सबसे प्रेरणादायक कहानी अभी बाकी थी...

राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने ऐसा जीवन जिया जिसने उन्हें केवल एक महान वैज्ञानिक नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं का आदर्श बना दिया।


जनता के राष्ट्रपति, युवाओं के मार्गदर्शक और अमर प्रेरणा

25 जुलाई 2002 को जब डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, तो पूरा देश गर्व से भर उठा। यह पहली बार था जब एक ऐसे वैज्ञानिक ने राष्ट्रपति भवन में प्रवेश किया था, जिसने अपना जीवन प्रयोगशालाओं, रॉकेटों और विद्यार्थियों के बीच बिताया था। लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। वे पहले की तरह ही सादगी से रहते थे। उनके लिए राष्ट्रपति भवन केवल एक कार्यस्थल था, शान-ओ-शौकत का प्रतीक नहीं।

राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनकी दिनचर्या बेहद अनुशासित रही। वे सुबह जल्दी उठते, प्रार्थना करते, पुस्तकें पढ़ते और फिर अपने कार्यों में लग जाते। उन्हें संगीत से विशेष प्रेम था और वे वीणा बजाना पसंद करते थे। विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म में भी उनकी गहरी रुचि थी। वे कुरआन का अध्ययन करते थे, साथ ही भगवद्गीता भी पढ़ते थे। उनका मानना था कि सभी धर्म इंसान को बेहतर बनने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते थे, "धर्म का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, बाँटना नहीं।"

राष्ट्रपति भवन में आने वाले अधिकांश अतिथि यह देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे कि भारत का राष्ट्रपति कितना सरल जीवन जीता है। उनके कमरे में अनावश्यक विलासिता की कोई वस्तु नहीं थी। उनके निजी सामान में कुछ कपड़े, कुछ पुस्तकें, एक वीणा और एक लैपटॉप था। वे मानते थे कि किसी व्यक्ति की महानता उसके पास मौजूद वस्तुओं से नहीं, बल्कि उसके विचारों और कर्मों से मापी जाती है।

डॉ. कलाम को बच्चों और युवाओं से विशेष लगाव था। यदि उनके कार्यक्रम में किसी विद्यालय या महाविद्यालय के छात्रों से मिलने का अवसर होता, तो वे उसे कभी नहीं छोड़ते थे। वे हजारों विद्यार्थियों के बीच घंटों खड़े होकर उनके प्रश्नों का उत्तर देते थे। वे प्रत्येक बच्चे से पूछते, "तुम्हारा सपना क्या है?" उनका विश्वास था कि जिस दिन भारत का हर बच्चा बड़े सपने देखने लगेगा, उसी दिन देश के विकास की गति कई गुना बढ़ जाएगी।

एक बार एक छात्र ने उनसे पूछा, "सर, सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?" डॉ. कलाम मुस्कुराए और बोले, "सपना देखो, फिर उस सपने को अपना लक्ष्य बनाओ, और जब तक वह पूरा न हो जाए, तब तक रुकना मत।" यह केवल एक उत्तर नहीं था, बल्कि उनके पूरे जीवन का सार था।

राष्ट्रपति पद से 2007 में कार्यकाल पूरा होने के बाद भी उन्होंने आराम का जीवन नहीं चुना। अधिकांश लोग इतने बड़े पद के बाद सार्वजनिक जीवन से दूर हो जाते हैं, लेकिन डॉ. कलाम ने फिर से वही काम शुरू किया जो उन्हें सबसे अधिक प्रिय था—पढ़ाना। वे देश के विभिन्न विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और प्रबंधन संस्थानों में जाकर विद्यार्थियों से मिलते, उन्हें विज्ञान, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करते। उनका मानना था कि भारत का भविष्य संसद या मंत्रालयों में नहीं, बल्कि कक्षाओं में बैठा हुआ है।

उन्होंने अपने जीवन में अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें "विंग्स ऑफ फायर", "इग्नाइटेड माइंड्स", "इंडिया 2020", "माय जर्नी" और "टर्निंग पॉइंट्स" विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन पुस्तकों में उन्होंने अपने संघर्ष, अनुभव और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना साझा किया। वे चाहते थे कि भारत केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, नैतिकता और नवाचार के क्षेत्र में भी विश्व का नेतृत्व करे।

डॉ. कलाम हमेशा कहते थे कि केवल सरकार देश का विकास नहीं कर सकती। इसके लिए हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। वे युवाओं से कहते थे कि वे केवल नौकरी पाने का सपना न देखें, बल्कि ऐसे उद्यमी बनें जो दूसरों को रोजगार दें। वे विज्ञान और तकनीक को समाज की समस्याओं का समाधान मानते थे। उनका विश्वास था कि यदि शिक्षा सही दिशा में दी जाए, तो गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसी अनेक समस्याएँ स्वतः कम हो जाएँगी।

उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह था कि वे हर व्यक्ति से समान व्यवहार करते थे। चाहे कोई बड़ा अधिकारी हो, वैज्ञानिक हो या कोई छोटा बच्चा—वे सभी को समान सम्मान देते थे। वे कभी किसी को उसके पद से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व से पहचानते थे। यही विनम्रता उन्हें करोड़ों भारतीयों के दिलों में विशेष स्थान दिलाती थी।

समय बीतता गया, लेकिन उनकी ऊर्जा कभी कम नहीं हुई। अस्सी वर्ष की आयु पार करने के बाद भी वे लगातार यात्रा करते रहे। वे कहते थे, "जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक विद्यार्थियों के बीच रहना चाहता हूँ।" शायद उन्हें स्वयं भी नहीं पता था कि उनकी अंतिम इच्छा सच होने वाली है।

27 जुलाई 2015 का दिन भारत के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। उस दिन डॉ. कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) शिलांग में "Creating a Livable Planet Earth" विषय पर व्याख्यान देने पहुँचे थे। वे मंच पर आए, छात्रों का अभिवादन किया और अपना व्याख्यान शुरू किया। कुछ ही मिनट बीते थे कि अचानक उन्हें अस्वस्थता महसूस हुई और वे मंच पर गिर पड़े। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। शाम को उनके निधन की खबर पूरे देश में फैल गई।

यह एक अद्भुत संयोग था कि जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन विद्यार्थियों को प्रेरित करने में बिताया, उसने अपनी अंतिम साँस भी विद्यार्थियों के बीच ही ली। यह उनके जीवन का सबसे सुंदर और सबसे प्रेरणादायक अध्याय बन गया।

उनके निधन के बाद पूरे भारत में सात दिनों का राजकीय शोक घोषित किया गया। लाखों लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुँचे। रामेश्वरम में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। लेकिन सच तो यह है कि डॉ. कलाम जैसे लोग कभी मरते नहीं। वे अपने विचारों, अपने कार्यों और अपनी प्रेरणा के माध्यम से सदैव जीवित रहते हैं।

आज भारत में लाखों बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक और सैनिक बनने का सपना देखते हैं। उनमें से अनेक यह स्वीकार करते हैं कि उन्हें यह प्रेरणा डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से मिली। उनकी जयंती, 15 अक्टूबर, को कई स्थानों पर विश्व छात्र दिवस (World Students' Day) के रूप में मनाया जाता है। यह केवल एक औपचारिक सम्मान नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि उन्होंने अपना जीवन विद्यार्थियों के भविष्य के लिए समर्पित कर दिया था।

डॉ. कलाम का जीवन हमें अनेक अमूल्य सीख देता है। वे सिखाते हैं कि गरीबी कभी भी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती, यदि मन में दृढ़ संकल्प हो। वे बताते हैं कि असफलता से डरना नहीं चाहिए, क्योंकि वही सफलता की पहली सीढ़ी होती है। वे यह भी सिखाते हैं कि महान बनने के लिए पहले अच्छा इंसान बनना आवश्यक है। ईमानदारी, अनुशासन, विनम्रता और निरंतर सीखते रहने की आदत ही व्यक्ति को ऊँचाइयों तक पहुँचाती है।

उनका सबसे प्रसिद्ध संदेश आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा है—"सपने वो नहीं होते जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वो होते हैं जो हमें सोने नहीं देते।" यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन जीने का मंत्र है।

जब भी कोई युवा कठिन परिस्थितियों में हार मानने लगता है, जब भी किसी छात्र को लगता है कि उसके पास संसाधन कम हैं, जब भी कोई व्यक्ति अपनी असफलताओं से निराश होता है, तब डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन उसे याद दिलाता है कि सफलता जन्म से नहीं मिलती, बल्कि मेहनत, धैर्य और विश्वास से अर्जित की जाती है।

रामेश्वरम की गलियों में अखबार बेचने वाला वह छोटा-सा बालक एक दिन भारत का राष्ट्रपति बना। उसने दुनिया को यह साबित कर दिया कि इंसान की पहचान उसके परिवार की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके सपनों की ऊँचाई और उन्हें पूरा करने के साहस से होती है।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम आज भी हर उस व्यक्ति के दिल में जीवित हैं, जो बड़े सपने देखने का साहस करता है और उन्हें पूरा करने के लिए ईमानदारी से मेहनत करता है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव एक उज्ज्वल दीपक की तरह मार्गदर्शन करता रहेगा।

"यदि तुम सूरज की तरह चमकना चाहते हो, तो पहले सूरज की तरह जलना सीखो।" यही डॉ. कलाम का संदेश था, यही उनका जीवन था, और यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।


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