राजस्थान के ब्यावर का प्रसिद्ध बादशाह मेला मुगल सम्राट अकबर और उनके नवरत्न राजा टोडरमल से जुड़ी एक लोकप्रिय लोककथा पर आधारित है। कहा जाता है कि एक बार सम्राट अकबर शिकार के लिए निकले थे। जंगल में अचानक डाकुओं ने उन पर हमला कर दिया और उनकी जान खतरे में पड़ गई। उस समय राजा टोडरमल ने अद्भुत साहस, बुद्धिमत्ता और युद्ध कौशल का परिचय देते हुए न केवल डाकुओं को पराजित किया, बल्कि सम्राट अकबर की जान भी बचा ली।
टोडरमल की इस वीरता और निष्ठा से प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें सम्मानस्वरूप ढाई दिन के लिए हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। इन ढाई दिनों के दौरान टोडरमल ने शाही वस्त्र धारण किए, हाथी और घोड़े पर सवार होकर नगर भ्रमण किया, प्रजा से मुलाकात की, उनकी समस्याएँ सुनीं और न्यायपूर्ण निर्णय दिए।
उन्होंने गरीबों और जरूरतमंदों में सोने-चाँदी के सिक्के, अशर्फियाँ, वस्त्र और अन्य उपहार वितरित किए। इस शाही जुलूस में बीरबल भी उनके साथ रहते थे, जो अपनी चतुराई, हास्य और बुद्धिमानी से लोगों का मनोरंजन करते थे।
माना जाता है कि टोडरमल की इसी अल्पकालीन बादशाहत की याद को जीवित रखने के लिए ब्यावर में हर वर्ष होली के बाद "बादशाह की सवारी" निकाली जाने लगी, जो समय के साथ बादशाह मेला के नाम से प्रसिद्ध हो गई। इस मेले में आज भी एक व्यक्ति बादशाह और दूसरा बीरबल का रूप धारण करता है तथा भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। हजारों लोग इस आयोजन में शामिल होकर रंग-गुलाल उड़ाते हैं और आपसी प्रेम, भाईचारे तथा सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देते हैं।
हालांकि, यह कथा स्थानीय लोकमान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है तथा अकबर द्वारा टोडरमल को ढाई दिन के लिए बादशाह बनाए जाने का स्पष्ट उल्लेख समकालीन मुगल इतिहास ग्रंथों, जैसे अकबरनामा और आईन-ए-अकबरी, में नहीं मिलता। इसलिए इतिहासकार इसे एक लोकप्रिय लोककथा और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखते हैं।
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