भारत की पवित्र भूमि पर हजारों वर्ष पहले हस्तिनापुर के पश्चिमी घने जंगलों में निषाद (भील) समुदाय का एक शक्तिशाली सरदार रहता था। उसी के घर एक तेजस्वी और साहसी बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम था एकलव्य। वह बचपन से ही अन्य बच्चों से अलग था। जहाँ उसके मित्र जंगलों में शिकार करना सीखते, पेड़ों पर चढ़ते और खेल-कूद में समय बिताते, वहीं एकलव्य घंटों अकेला बैठकर धनुष-बाण चलाने की कल्पना करता रहता। उसकी आँखों में एक ऐसा सपना था जो उस समय लगभग असंभव माना जाता था। वह केवल एक शिकारी नहीं बनना चाहता था, बल्कि संसार का सबसे महान धनुर्धर बनना चाहता था। उसे पता था कि पूरे आर्यावर्त में यदि कोई धनुर्विद्या का सबसे बड़ा गुरु है, तो वे हैं आचार्य द्रोणाचार्य, जो हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षा देते थे। एक दिन उसके पिता ने उसकी उदासी का कारण पूछा, तब एकलव्य ने विनम्रता से कहा, "पिताजी, मैं द्रोणाचार्य का शिष्य बनकर धनुर्विद्या सीखना चाहता हूँ।" बेटे की आँखों में जलता हुआ सपना देखकर पिता ने उसे आशीर्वाद दिया और हस्तिनापुर जाने की अनुमति दे दी।
कई दिनों तक जंगलों, पहाड़ों और नदियों को पार करते हुए एकलव्य अंततः द्रोणाचार्य के गुरुकुल पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि विशाल मैदान में अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव सहित अनेक राजकुमार धनुष-बाण का अभ्यास कर रहे हैं। उनके बीच खड़े थे महान गुरु द्रोणाचार्य। एकलव्य का हृदय खुशी से भर उठा। वह दौड़कर उनके चरणों में झुक गया और बोला, "गुरुदेव, कृपया मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। मैं धनुर्विद्या सीखना चाहता हूँ।" द्रोणाचार्य ने उसका परिचय पूछा। जब उन्हें पता चला कि वह वनवासी समुदाय का बालक है, तो उन्होंने उसे शिक्षा देने से मना कर दिया। तभी अर्जुन ने भी कठोर स्वर में कहा, "यह गुरुकुल राजकुमारों के लिए है। तुम यहाँ से चले जाओ।" यह सुनकर एकलव्य का हृदय टूट गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने किसी से कोई शिकायत नहीं की। वह चुपचाप वहाँ से लौट गया। उस दिन उसे समाज के भेदभाव का दर्द तो मिला, लेकिन उसके सपनों की लौ बुझी नहीं।
घर लौटने के बाद एकलव्य ने हार मानने के बजाय एक ऐसा निर्णय लिया जिसने उसे इतिहास में अमर बना दिया। उसने नदी किनारे की मिट्टी से द्रोणाचार्य की एक सुंदर प्रतिमा बनाई और उसे अपना गुरु मान लिया। प्रतिदिन सुबह सूर्योदय से पहले वह उठता, प्रतिमा के सामने सिर झुकाकर प्रणाम करता और फिर घंटों तक धनुष-बाण का अभ्यास करता। कभी तेज धूप पड़ती, कभी मूसलाधार वर्षा होती, कभी उसके हाथों में छाले पड़ जाते, कभी उँगलियों से खून निकल आता, लेकिन उसके अभ्यास में कभी कमी नहीं आई। दिन महीनों में बदले और महीने वर्षों में। उसकी अथक मेहनत, अनुशासन और अटूट विश्वास ने उसे एक साधारण वनवासी बालक से असाधारण धनुर्धर बना दिया। अब उसका हर तीर अपने लक्ष्य के बिल्कुल बीच में जाकर लगता था। जंगल के लोग उसकी अद्भुत कला देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे।
एक दिन जब वह अभ्यास कर रहा था, तभी पास में एक कुत्ता लगातार भौंकने लगा। पहले तो उसने उसे अनदेखा किया, लेकिन जब भौंकने की आवाज़ लगातार उसके अभ्यास में बाधा बनने लगी, तब उसने बिना कुत्ते को घायल किए एक के बाद एक सात तीर चलाए। अगले ही क्षण कुत्ते का मुँह तीरों से भर चुका था, लेकिन उसके शरीर पर एक भी चोट नहीं थी। उसी समय कुछ दूरी पर द्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ जंगल में अभ्यास कर रहे थे। जब उन्होंने उस कुत्ते को देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। द्रोणाचार्य ने कहा, "इतना अद्भुत निशाना केवल कोई महान धनुर्धर ही लगा सकता है।" वे अपने शिष्यों के साथ उस धनुर्धर की खोज में निकले और थोड़ी दूर पर उन्हें एकलव्य दिखाई दिया। द्रोणाचार्य ने उसकी प्रशंसा करते हुए पूछा, "तुमने यह अद्भुत धनुर्विद्या किससे सीखी?" एकलव्य ने विनम्रता से हाथ जोड़कर उत्तर दिया, "गुरुदेव, मैंने यह विद्या आपसे ही सीखी है।" द्रोणाचार्य आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि उन्होंने तो कभी उसे शिक्षा ही नहीं दी थी। तब एकलव्य ने उन्हें अपनी मिट्टी की प्रतिमा दिखाई और बताया कि उसी प्रतिमा को गुरु मानकर उसने वर्षों तक अभ्यास किया है। यह सुनकर अर्जुन चिंतित हो गए, क्योंकि द्रोणाचार्य ने उन्हें संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन दिया था।
तब द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा, "यदि मैं तुम्हारा गुरु हूँ, तो मुझे गुरु-दक्षिणा दो।" एकलव्य ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "गुरुदेव, आप जो भी माँगेंगे, मैं खुशी-खुशी दे दूँगा।" द्रोणाचार्य ने कहा, "मुझे तुम्हारे दाएँ हाथ का अंगूठा चाहिए।" यह सुनते ही वहाँ उपस्थित सभी लोग स्तब्ध रह गए। बिना अंगूठे के धनुष चलाना लगभग असंभव था। कुछ क्षणों के लिए वातावरण बिल्कुल शांत हो गया, लेकिन एकलव्य ने बिना किसी शिकायत और बिना एक पल की हिचकिचाहट के अपना चाकू निकाला, अपने दाएँ हाथ का अंगूठा काटा और उसे द्रोणाचार्य के चरणों में रख दिया। उसके चेहरे पर दर्द से अधिक संतोष था, क्योंकि उसने अपने गुरु को गुरु-दक्षिणा अर्पित कर दी थी। यह दृश्य देखकर स्वयं द्रोणाचार्य भी भीतर से भावुक हो उठे। उन्होंने एकलव्य को आशीर्वाद दिया कि उसका नाम युगों-युगों तक गुरु-भक्ति और त्याग के प्रतीक के रूप में लिया जाएगा। लेकिन एकलव्य की कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। अंगूठा कट जाने के बाद भी उसने अभ्यास नहीं छोड़ा। उसने अपनी बाकी उँगलियों से धनुष चलाना सीखा और फिर से एक महान धनुर्धर बन गया। उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई और आज भी उसका नाम अटूट परिश्रम, आत्मविश्वास, गुरु-भक्ति और त्याग की सबसे महान मिसाल के रूप में लिया जाता है।
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