बहुत समय पहले की बात है। कहा जाता है कि उस समय हाथियों की सूँड़ आज की तरह लंबी नहीं होती थी। उनकी नाक छोटी और ठूँठ जैसी थी।
एक साल कई महीनों तक बारिश नहीं हुई। तालाब और झीलें सूखने लगीं और नदियों-नालों में भी बहुत कम पानी रह गया। जंगल के सभी जानवर प्यास से बेहाल थे और पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहे थे।
जंगल से कुछ ही दूरी पर एक नदी बहती थी। एक बहादुर हाथी ने पानी की तलाश में उस नदी तक जाने का फैसला किया।
वह धीरे-धीरे चलता हुआ नदी के किनारे पहुँचा। उस नदी में एक चमकीले हरे रंग का मगरमच्छ रहता था।
हाथी को देखते ही मगरमच्छ चिल्लाया:
“यहाँ से चले जाओ! पहले ही पानी बहुत कम है। अगर तुमने पानी पीना शुरू कर दिया, तो मेरे लिए क्या बचेगा?”
हाथी जानता था कि मगरमच्छ से झगड़ा करना खतरे से खाली नहीं है। इसलिए उसने सोचा कि वह तब नदी पर वापस आएगा, जब मगरमच्छ सो रहा होगा।
उसी नदी में एक चमकीले हरे रंग का मेंढक भी रहता था। जब भी मगरमच्छ नदी में तैरता, मेंढक उसकी पीठ पर कूदकर बैठ जाता और मुफ्त की सवारी का आनंद लेता।
धीरे-धीरे मगरमच्छ इस बात से बहुत परेशान हो गया था। उसने कई बार अपनी पीठ को जोर-जोर से हिलाकर मेंढक को गिराने की कोशिश की, लेकिन हर बार असफल रहा।
मेंढक हँसते हुए कहता:
“हा हा हा!”
एक दिन मगरमच्छ एक चट्टान पर आराम कर रहा था। हाथी ने इसे पानी पीने का अच्छा मौका समझा। वह चुपचाप नदी के पास गया और पानी पीने लगा।
तभी मेंढक मगरमच्छ की पीठ पर कूद गया और उसकी नींद खराब कर दी।
मगरमच्छ बहुत गुस्से में आ गया!
वह नदी में तेजी से इधर-उधर तैरने लगा और अपने शरीर को जोर-जोर से हिलाने लगा।
वह मेंढक से चिल्लाया:
“अब मैं तुम्हें अपनी पीठ से जरूर गिरा दूँगा!”
लेकिन मेंढक अपनी जगह से जरा भी नहीं हिला।
अचानक मगरमच्छ की नजर हाथी पर पड़ी।
वह गरजकर बोला:
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी नदी का पानी पीने की, जबकि मैंने तुम्हें मना किया था?”
मगरमच्छ मेंढक को अपनी पीठ से नहीं हटा पा रहा था, इसलिए उसने अपना सारा गुस्सा हाथी पर निकालने का फैसला किया।
वह तेजी से हाथी की ओर झपटा और उसकी नाक पकड़ ली। फिर उसे खींचते हुए नदी के गहरे पानी की ओर ले जाने लगा।
बेचारा हाथी पीछे की ओर पूरी ताकत से खिंचने लगा और रोते हुए बोला:
“मुझे छोड़ दो! कृपया मुझे छोड़ दो! मेरी नाक में बहुत दर्द हो रहा है!”
लेकिन मगरमच्छ को उस पर बिल्कुल दया नहीं आई।
फिर हाथी ने पूरी ताकत लगाई और एक जोरदार झटके के साथ अपनी नाक मगरमच्छ के जबड़ों से छुड़ा ली।
लेकिन इस भयंकर खींचतान में हाथी की नाक बुरी तरह खिंचकर बहुत लंबी हो गई थी!
हाथी दर्द और गुस्से से परेशान था। उसने अपनी नई लंबी सूँड़ उठाई और नदी का सारा पानी अपनी सूँड़ में खींच लिया।
फिर उसने वह पानी एक जोरदार फुहार के साथ मगरमच्छ और मेंढक पर उड़ा दिया।
पानी के साथ नदी की बहुत सारी गहरी, मोटी और काली मिट्टी भी दोनों के ऊपर जा गिरी।
मगरमच्छ और मेंढक पूरी तरह कीचड़ से ढक गए।
कहा जाता है कि उस दिन के बाद से हाथियों की नाक लंबी होकर सूँड़ बन गई।
और जहाँ तक मगरमच्छ और मेंढक की बात है, कीचड़ की वजह से उनका सुंदर चमकीला हरा रंग हमेशा के लिए फीका पड़ गया।
इसीलिए आज भी मगरमच्छ और मेंढक वैसे चमकीले हरे रंग के नहीं दिखाई देते, जैसे वे बहुत पहले हुआ करते थे।
कहानी की सीख
मुश्किल परिस्थितियों में साहस और धैर्य बनाए रखना चाहिए। हमारी कोई कमजोरी या अलग पहचान आगे चलकर हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
साथ ही, कहानी यह भी सिखाती है कि स्वार्थ और दूसरों के साथ क्रूर व्यवहार करने का परिणाम हमेशा अच्छा नहीं होता।

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