एक दिन एक ब्राह्मण घने जंगल से होकर जा रहा था। तभी एक मगरमच्छ ने उसे पुकारकर कहा,
“हे ब्राह्मण! मेरी मदद करो! मैं अपने माता-पिता से बिछड़ गया हूँ, जो पवित्र गंगा नदी में रहते हैं। लेकिन मुझे वहाँ जाने का रास्ता नहीं मालूम। कृपया मुझे उनके पास पहुँचा दो!”
ब्राह्मण बहुत दयालु व्यक्ति था। उसने मगरमच्छ को एक बड़ी बोरी में रखा, बोरी को अपनी पीठ पर उठाया और उसे लेकर नदी तक पहुँच गया।
वहाँ पहुँचकर उसने कहा,
“लो, हम आ गए!”
और उसने मगरमच्छ को बोरी से बाहर निकाल दिया।
जैसे ही मगरमच्छ आज़ाद हुआ, उसने डरावनी नजरों से ब्राह्मण की ओर देखा और कहा,
“अब खाने के लिए तैयार हो जाओ!”
ब्राह्मण यह सुनकर स्तब्ध रह गया।
“तुम मुझे कैसे खा सकते हो? मैंने तो अभी तुम्हारी मदद की है!”
लेकिन मगरमच्छ ने उसकी टांग पकड़ ली और उसे पानी की ओर घसीटने लगा।
ब्राह्मण चिल्लाया,
“तुम कितने कृतघ्न हो!”
मगरमच्छ ने शांत भाव से उत्तर दिया,
“मैं कृतघ्न नहीं हूँ। मैं तो बस दुनिया की उस पुरानी प्रथा का पालन कर रहा हूँ—जो चीज तुम्हारा पेट भर सकती है, उसे खा लेना चाहिए।”
ब्राह्मण ने कहा,
“मैं इस प्रथा से सहमत नहीं हूँ। यह तो बहुत क्रूर और बर्बर है! चलो, हम तीन निष्पक्ष न्यायाधीशों से फैसला करवाते हैं। अगर तीनों न्यायाधीश कह दें कि यह प्रथा सही है, तो तुम केवल मुझे ही नहीं, बल्कि मेरे पूरे परिवार को भी खा सकते हो।”
स्वार्थी मगरमच्छ ने मन ही मन सोचा,
“अगर मैं अभी इस ब्राह्मण को खा गया, तो उसके पूरे परिवार को खाने का सुनहरा मौका हाथ से निकल जाएगा!”
इसलिए उसने ब्राह्मण की टांग छोड़ दी और तीन न्यायाधीशों की तलाश करने के लिए तैयार हो गया।
दोनों साथ-साथ जंगल में चल पड़े।
कुछ दूर जाने के बाद उन्हें एक आम का पेड़ दिखाई दिया।
ब्राह्मण ने उसे सारी घटना सुनाई और पूछा,
“क्या यह उचित है कि जो चीज हमें जीवित रखने में मदद करती है, उसी को हम खा जाएँ?”
आम के पेड़ ने उत्तर दिया,
“हाँ! इंसान मेरी छाया में बैठते हैं, मेरे सारे फल खाते हैं और फिर मुझे ईंधन के लिए काट देते हैं। यही तो दुनिया का नियम है।”
पहला फैसला ब्राह्मण के विरुद्ध गया।
मगरमच्छ खुशी से मुस्कुराने लगा।
कुछ मील आगे जाने पर उन्हें एक गाय मिली।
ब्राह्मण ने उससे भी वही सवाल पूछा।
गाय ने कहा,
“हाँ, यह सही है। मैं अपनी पूरी जिंदगी इंसानों को दूध देती हूँ। लेकिन जब मैं बूढ़ी हो जाती हूँ और दूध देना बंद कर देती हूँ, तो इंसान मुझे छोड़ देते हैं और जंगली जानवरों का शिकार बनने के लिए छोड़ देते हैं।”
अब दो फैसले ब्राह्मण के विरुद्ध हो चुके थे।
मगरमच्छ जोर-जोर से हँसने लगा।
“हा हा हा! दो न्यायाधीशों ने मेरे पक्ष में फैसला दे दिया है! अब केवल एक न्यायाधीश बाकी है!”
वे दोनों आगे बढ़ते गए।
कुछ देर बाद उन्हें रास्ते के किनारे एक लोमड़ी शांत बैठी दिखाई दी।
ब्राह्मण ने लोमड़ी को पूरी कहानी सुनाई और वही सवाल पूछा।
लोमड़ी ने ध्यान से पूरी बात सुनी। फिर उसने सोचते हुए अपना सिर थोड़ा टेढ़ा किया।
वह बोली,
“फैसला सुनाने से पहले मेरा एक छोटा-सा सवाल है। इतना बड़ा मगरमच्छ इतनी छोटी-सी बोरी के अंदर आखिर कैसे आ सकता है? मुझे तो यह बिल्कुल असंभव लगता है।”
मगरमच्छ तुरंत अकड़कर बोला,
“असंभव? बकवास! मैं तुम्हें बिल्कुल दिखाता हूँ कि मैं इस बोरी में कैसे आया था।”
यह कहते हुए वह गर्व से वापस बोरी के अंदर घुस गया।
लोमड़ी ने चुपचाप ब्राह्मण की ओर देखा।
ब्राह्मण तुरंत समझ गया कि लोमड़ी क्या चाहती है।
उसने पास पड़ा एक बड़ा पत्थर उठाया और बोरी के अंदर डाल दिया।
इस तरह दुष्ट और कृतघ्न मगरमच्छ को उसके स्वार्थ की सजा मिल गई और ब्राह्मण सुरक्षित बच गया।
लोमड़ी ने भी कई दिनों तक भरपेट भोजन किया।
ब्राह्मण अपने घर लौट गया और उसने फिर कभी उन लोगों पर भरोसा नहीं किया, जो मगरमच्छ जैसी मुस्कान के साथ मदद की गुहार लगाते हैं।
कहानी की सीख
कृतघ्नता और स्वार्थ का अंत हमेशा बुरा होता है।
दुष्ट व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, उसकी कमजोरी और घमंड को समझकर की गई थोड़ी-सी बुद्धिमानी भी उसे पूरी तरह परास्त कर सकती है।

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