एक समय की बात है। एक गरीब लकड़हारा था। एक दिन जंगल में लकड़ी काटते-काटते वह बहुत थक गया। वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया और कुछ देर आराम करने लगा।
उसी समय एक छोटी-सी चिड़िया वहाँ से उड़ती हुई निकली। उसकी नज़र थके-हारे लकड़हारे पर पड़ी। उसकी दयनीय हालत देखकर चिड़िया को बहुत दुख हुआ।
उसने सोचा, “मुझे इसकी मदद करनी चाहिए।”
वह चुपचाप उड़कर लकड़हारे के पास बैठ गई।
कुछ ही देर में लकड़हारे को नींद आ गई। तभी उस छोटी चिड़िया ने उसके पास एक सोने का अंडा रखा और उड़कर चली गई।
जब लकड़हारे की आँख खुली तो वह चमचमाता हुआ अंडा देखकर हैरान रह गया। उसने जल्दी से उसे उठाया और सुरक्षित अपनी जेब में रख लिया।
फिर उसने काटी हुई लकड़ियों का छोटा-सा गट्ठर बाँधा और उसे उस दुकानदार के पास ले गया, जहाँ वह रोज़ अपनी लकड़ियाँ बेचता था।
दुकानदार ने गट्ठर देखकर कहा, “आज इतना छोटा गट्ठर? तुम तो रोज़ इससे बहुत बड़ा गट्ठर लाते हो। लगता है आज तुमने ज्यादा मेहनत नहीं की!”
तब लकड़हारे ने उसे बताया कि पेड़ के नीचे आराम करते समय उसे एक सोने का अंडा मिला है।
दुकानदार बहुत चालाक था। उसने तुरंत समझ लिया कि यह अंडा बहुत कीमती है। लेकिन उसने अपने चेहरे पर ऐसा भाव रखा जैसे उसे इसमें कोई खास दिलचस्पी ही न हो।
उसने भोले लकड़हारे से कहा, “मैं तुम्हें इस अंडे के बदले एक सोने का सिक्का दे सकता हूँ।”
लकड़हारा उस अंडे की असली कीमत से अनजान था। उसने तुरंत सौदा स्वीकार कर लिया।
इसके बाद दुकानदार ने धीरे से कहा, “अगर तुम मुझे वह चिड़िया लाकर दे दो, जिसने यह सोने का अंडा दिया है, तो मैं तुम्हें पाँच सोने के सिक्के दूँगा।”
पाँच सोने के सिक्कों का नाम सुनकर लकड़हारा बहुत खुश हो गया। उसने चिड़िया को पकड़ने की कोशिश करने का वादा किया और घर चला गया।
अगले दिन वह उसी पेड़ के पास पहुँचा और सोने का नाटक करते हुए बैठ गया।
कुछ देर बाद वही छोटी चिड़िया फिर वहाँ आई और भरोसे से उसके पास आकर बैठ गई।
तभी लकड़हारा अचानक उठा और उसने चिड़िया को पकड़ लिया।
वह खुशी से बोला, “अब मैं तुम्हें दुकानदार को बेचकर पाँच सोने के सिक्के लूँगा!”
चिड़िया ने दुखी होकर कहा, “लेकिन एक सोने का अंडा पाँच सोने के सिक्कों से सौ गुना अधिक मूल्यवान है! क्या तुम्हें यह पता नहीं?”
फिर उसने कहा, “उस दुकानदार ने तुम्हें पूरी तरह मूर्ख बना दिया है!”
यह सुनकर लकड़हारे का दिल बैठ गया। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया।
उसने दुखी होकर कहा, “मुझे माफ कर दो। लालच में आकर मैंने तुम्हें नुकसान पहुँचाया।”
और उसने चिड़िया को तुरंत आज़ाद कर दिया।
लेकिन चिड़िया जमीन पर गिर पड़ी।
उसने धीमी आवाज़ में कहा, “अब मेरा अंत निकट है। मैं भाग्यशाली चिड़ियों के परिवार से हूँ। हम इंसानों के लिए सौभाग्य लेकर आती हैं, लेकिन अगर हमें कभी किसी इंसान के हाथों पकड़ लिया जाए, तो हमारी मृत्यु निश्चित होती है।”
यह सुनकर लकड़हारा फूट-फूटकर रोने लगा।
उसने पूछा, “क्या मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकता हूँ?”
चिड़िया ने उसकी ओर देखा और कहा, “जब मेरी मृत्यु हो जाए, तब मेरे पंख से एक पंख निकाल लेना और उसे आग की लौ के पास ले जाना। तुम तुरंत मेरे घर पहुँच जाओगे। वहाँ मेरा यह पंख मेरे परिवार को देना और उन्हें पूरी सच्चाई बताना—कुछ भी छिपाना मत।”
इतना कहकर उस भाग्यशाली चिड़िया ने अपनी अंतिम साँस ली।
लकड़हारे ने वैसा ही किया जैसा चिड़िया ने कहा था।
कुछ ही क्षणों में वह खुद को भाग्यशाली चिड़िया के परिवार से घिरा हुआ पाया। उसने उन्हें वह पंख दिखाया और अपनी पूरी कहानी ईमानदारी से सुना दी। उसने अपनी कोई गलती नहीं छिपाई।
“हमें जल्दी करना होगा!” चिड़िया के पिता ने कहा।
उन्होंने उस पंख को सावधानी से जमीन पर रखा और उसके चारों ओर गोल-गोल घूमते हुए उछलने लगे।
दस पूरे चक्कर लगाने के बाद उन्होंने उस पंख को धीरे से छुआ।
तभी ऐसा लगा जैसे पूरा जंगल एक गहरी साँस लेकर शांत हो गया हो।
अचानक उस भाग्यशाली चिड़िया का निर्जीव शरीर वहाँ आ पहुँचा।
माँ चिड़िया और उसकी बहनें तुरंत आगे बढ़ीं। वे हरे पत्ते और कुछ दुर्लभ घास लेकर आईं, जिनमें मृत प्राणी को जीवित करने की शक्ति थी।
उन्होंने उन पत्तियों और घास को बहुत सावधानी से चिड़िया की चोंच में रखा।
कुछ ही क्षणों में चिड़िया की आँखें खुल गईं!
लकड़हारे की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसकी आँखों में राहत और खुशी के आँसू आ गए।
भाग्यशाली चिड़िया ने उसकी ओर देखा और कहा,
“भाग्य आता है और चला जाता है—हम भाग्यशाली चिड़ियाँ भी उसी तरह आती-जाती हैं। लेकिन हम लालची लोगों के साथ नहीं रहतीं।”
लकड़हारे ने शर्म से अपना सिर झुका लिया।
उसने कहा, “अपनी मूर्खता के कारण मैंने तुम्हें लगभग हमेशा के लिए खो दिया था।”
चिड़िया ने प्यार से कहा, “हिम्मत मत हारो, मित्र। जब मुझे सच में तुम्हारी मदद की ज़रूरत थी, तब तुमने मेरी मदद की। इसलिए मैं एक दिन फिर तुम्हारे पास लौटूँगी। लेकिन तुम्हें उस समय का इंतज़ार करना होगा।”
लकड़हारा भारी मन से अपने घर लौट आया।
हालाँकि उसके हाथ खाली थे, लेकिन उसके दिल में एक वादा था—और एक गहरी समझ भी।
उसे समझ आ गया था कि सबसे बड़ा सौभाग्य वह नहीं जो अचानक हमें मिल जाए, बल्कि वह है जिसे हम अपनी ईमानदारी, दया और अच्छे कर्मों से खुद पैदा करते हैं।
कहानी की सीख
लालच अच्छे भाग्य को दूर कर देता है।
सच्चा सौभाग्य उन्हीं के साथ रहता है जो आभारी, दयालु और ईमानदार होते हैं।
हमसे गलती हो जाए तो सच्चे मन से पछताना और अपनी गलती को सुधारने की कोशिश करना हमें दूसरा अवसर दिला सकता है। लेकिन उसके लिए धैर्य रखना भी जरूरी है।
याद रखें—लालच हमें मिले हुए सौभाग्य को भी खो सकता है, जबकि ईमानदारी और दया हमारे जीवन का सबसे बड़ा धन बन सकती है।

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