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बुद्धि बड़ी या धन?


एक समय की बात है। एक राजा और एक धनी व्यापारी रहते थे। दोनों का एक-एक बेटा था। दोनों लड़के एक ही विद्यालय में पढ़ते थे और धीरे-धीरे बहुत अच्छे मित्र बन गए। वे विद्यालय के बाहर भी हमेशा साथ रहते थे। कभी व्यापारी का बेटा राजमहल में भोजन करता, तो कभी राजकुमार अपने मित्र के घर भोजन करने जाता।

एक दिन दोनों मित्रों में इस बात पर बहस शुरू हो गई कि धन और बुद्धि में से अधिक शक्तिशाली कौन है।

राजकुमार ने कहा, “धन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।”

व्यापारी के बेटे ने कहा, “नहीं, बुद्धि धन से अधिक शक्तिशाली है।”

दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे। आखिर व्यापारी के बेटे ने कहा, “इस तरह बहस करने से कोई लाभ नहीं। क्यों न हम किसी दूर देश में जाएँ और एक वर्ष तक किसी के यहाँ काम करें? फिर देखेंगे कि धन अधिक सफल होता है या बुद्धि।”

राजकुमार को यह बात पसंद आई और दोनों ने यात्रा की तारीख तय कर ली।

निर्धारित दिन दोनों घर से कुछ धन लेकर निकल पड़े। कुछ दूर जाने के बाद राजकुमार सोचने लगा कि उसके माता-पिता उसे ढूँढ़ रहे होंगे, क्योंकि उसने उन्हें अपने जाने के बारे में नहीं बताया था।

व्यापारी के बेटे ने उसे समझाया, “चिंता मत करो। मैंने अपने घरवालों को हमारे जाने के बारे में बता दिया है। वे राजा को भी बता देंगे।”

चलते-चलते दोनों एक दूसरे देश में पहुँचे। वहाँ व्यापारी के बेटे ने कहा, “अब हमें काम ढूँढ़ना चाहिए।”

लेकिन राजकुमार को नौकर बनकर काम करना पसंद नहीं था। उसने कहा, “मेरे पास इतना धन है कि मैं एक-दो साल आराम से रह सकता हूँ।”

व्यापारी के बेटे ने कहा, “तुम जैसा चाहो करो, लेकिन मैं काम जरूर करूँगा।”

वह एक गाँव में गया और वहाँ के विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिल गई। उसके विद्यार्थी उसे भोजन भी देते थे और थोड़ा वेतन भी देते थे। इसलिए उसे अपने साथ लाया हुआ धन खर्च करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।

उधर राजकुमार ने गाँव में एक घर किराए पर लिया और मौज-मस्ती में रहने लगा। कुछ ही समय में उसने अपने बुरे दोस्तों के साथ सारा धन खर्च कर दिया।

जब धन समाप्त हो गया तो उसके सभी तथाकथित मित्र उसे छोड़कर चले गए। राजकुमार भूखा और कमजोर होकर अपने मित्र के पास पहुँचा और बोला, “या तो मुझे मेरे पिता के पास वापस भेज दो या मेरे लिए कोई काम ढूँढ़ दो।”

उसके मित्र ने उसकी सहायता करने का वादा किया। कुछ पूछताछ के बाद उसे एक किसान मिला, जिसे एक नौकर चाहिए था। उसका काम था रोज बैल को चराने ले जाना और एक पानी की नांद भरना।

राजकुमार ने सोचा कि यह काम तो बहुत आसान है। इसलिए उसने किसान की नौकरी स्वीकार कर ली।

किसान ने उसके साथ कुछ अजीब शर्तें रखीं।

यदि राजकुमार नौकरी छोड़ता, तो उसकी एक छोटी उँगली काट दी जाती। लेकिन यदि किसान उसे ठीक से काम करने के बावजूद नौकरी से निकालता, तो किसान की अपनी एक छोटी उँगली काटी जाती।

इसके अलावा, यदि राजकुमार बैल को ठीक से चराता और पानी की नांद भरता, तो उसे केले के पत्ते जितना पका हुआ चावल मिलता। यदि वह काम पूरा नहीं करता, तो उसे केवल इमली के पत्ते जितना चावल मिलता।

राजकुमार ने इन शर्तों को आसानी से स्वीकार कर लिया, क्योंकि उसे लगा कि काम में केवल एक-दो घंटे लगेंगे।

लेकिन पहले ही दिन उसकी मुश्किल शुरू हो गई।

जब वह बैल को चराने ले गया तो बैल घास खाने के बजाय दूसरे जानवरों के पीछे भागने लगा। राजकुमार उसके पीछे भागता रहा और किसी तरह उसे वापस लाता। लेकिन बैल फिर भाग जाता।

आखिरकार राजकुमार उसे वापस घर लाकर गोशाला में बंद करने में भी बड़ी मुश्किल से सफल हुआ।

इसके बाद उसे पानी की नांद भरने के लिए कहा गया।

लेकिन नांद के नीचे एक छेद था और वह एक पुराने कुएँ के ऊपर रखी थी। राजकुमार जितना पानी डालता, उतना ही पानी नीचे बह जाता।

राजकुमार इतना मूर्ख था कि उसे छेद दिखाई ही नहीं दिया। वह थक जाने तक पानी डालता रहा।

काम पूरा न होने के कारण उसे रात में केवल इमली के पत्ते जितना चावल मिला।

ऐसा रोज होने लगा और राजकुमार भूखा रहने लगा। लेकिन वह नौकरी छोड़कर भाग नहीं सकता था, क्योंकि उसे अपनी छोटी उँगली कटने का डर था।

उधर व्यापारी के बेटे को अपने मित्र की चिंता होने लगी। एक दिन वह उससे मिलने पहुँचा और उसे इतना कमजोर देखकर हैरान रह गया।

जब उसे पता चला कि राजकुमार को रोज केवल इमली के पत्ते जितना चावल मिल रहा है, तो उसने कहा, “तुम मेरी जगह विद्यालय में पढ़ाओ और मैं किसान के यहाँ काम करता हूँ।”

अगली सुबह व्यापारी का बेटा बैल को चराने ले गया। बैल उसके साथ भी वही करने लगा और दूसरे जानवरों के पीछे भागता रहा।

दोपहर में वह बैल को वापस लाया और पानी की नांद भरने लगा। उसने तुरंत नांद के नीचे का छेद देख लिया और उसे मिट्टी से बंद कर दिया। फिर उसने नांद को आसानी से पानी से भर दिया।

शाम को बैल को चराकर वापस लाने पर किसान ने उसे केले के पत्ते जितना चावल दिया। यह इतना अधिक था कि वह एक दिन में भी पूरा नहीं खा सकता था।

अगले दिन व्यापारी के बेटे ने सोचा कि बैल उसे और परेशान न करे। वह एक मोटी रस्सी लेकर गया और बैल को पेड़ से बाँध दिया।

लेकिन उसने सोचा कि इस तरह बैल को पर्याप्त घास नहीं मिलेगी। इसलिए उसने बैल से हमेशा के लिए छुटकारा पाने की योजना बनाई।

दोपहर में वह एक छोटी कुल्हाड़ी लेकर बैल को उस जगह ले गया जहाँ कई दूसरे मवेशी चर रहे थे। मौका देखकर उसने बैल के सिर पर कुल्हाड़ी मार दी और उसका शव पास की खाई में फेंक दिया।

फिर उसने कुल्हाड़ी छिपा दी और किसान के पास जाकर कहा, “बैल दूसरे जानवर से लड़ने लगा था। लड़ते-लड़ते वह खाई में गिर गया और मर गया।”

किसान ने जाकर देखा तो सचमुच बैल खाई में मरा पड़ा था। इसलिए उसने अपने चालाक नौकर की बात पर विश्वास कर लिया।

कुछ दिनों बाद किसान की धान की फसल पक गई। उसने व्यापारी के बेटे से कहा, “जाओ और खेत में धान काटो।”

उसने पूछा, “मैं इसे कैसे काटूँ?”

किसान ने कहा, “दरांती से।”

वह बोला, “तो फिर दरांती ही धान काटेगी, मैं नहीं।”

किसान ने गुस्से में कहा, “जैसा चाहो करो। दरांती को लेकर जाओ, शायद वह खुद ही सब जानती हो।”

व्यापारी का बेटा दरांती लेकर खेत में गया। वहाँ उसने देखा कि दरांती धूप में गर्म हो गई थी।

उसने कहा, “बेचारी दरांती को तेज बुखार है। मैं इसे छाया में रख देता हूँ, जब तक यह ठीक न हो जाए।”

वह दरांती को छाया में रखकर आराम करने लगा।

कुछ देर बाद किसान वहाँ पहुँचा और गुस्से से चिल्लाया, “मैंने तुम्हें यहाँ घूमने के लिए भेजा था या धान काटने के लिए?”

व्यापारी के बेटे ने कहा, “धान काटने के लिए, लेकिन दरांती को तेज बुखार हो गया है। देखिए, कितनी गर्म है।”

किसान ने कहा, “तुम तो बिल्कुल मूर्ख हो! यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं। घर जाओ और बड़े घर में आग जलाकर पानी गर्म करना। जब तक मैं लौटूँ, सब तैयार होना चाहिए।”

व्यापारी के बेटे ने किसान के शब्दों का अपने मतलब के अनुसार अर्थ निकाला। वह वापस गया और किसान के सबसे बड़े घर में आग लगा दी।

किसान ने आग की लपटें देखीं और दौड़ता हुआ वापस आया।

उसने गुस्से से पूछा, “तुमने यह क्या कर दिया?”

व्यापारी के बेटे ने मासूमियत से कहा, “मैंने तो वही किया जो आपने कहा था। मैं आपके किसी आदेश की अवहेलना कैसे कर सकता हूँ?”

किसान उसके खिलाफ कुछ नहीं कर सका। उसे डर था कि अगर वह उसे नौकरी से निकालेगा तो उसकी अपनी छोटी उँगली काटनी पड़ेगी।

इसलिए उसने उसे किसी और तरीके से हटाने की योजना बनाई।

अगले दिन किसान ने व्यापारी के बेटे को बुलाया और कहा, “मेरे ससुर को पत्र देकर यह खबर पहुँचा दो कि घर दुर्भाग्य से जल गया है।”

व्यापारी का बेटा पत्र लेकर चल पड़ा।

रास्ते में उसने सोचा कि देखना चाहिए कि पत्र में वास्तव में क्या लिखा है।

उसने पत्र खोला और पढ़ा कि किसान ने अपने ससुर से कहा था कि पत्र लेकर आने वाले व्यक्ति को तुरंत मार डालें।

व्यापारी के बेटे ने तुरंत वह पत्र फाड़ दिया।

फिर उसने किसान के नाम से एक नया पत्र लिखा:

“पत्र लाने वाला बहुत अच्छा और योग्य नौकर है। मैं चाहता हूँ कि वह हमारे परिवार में विवाह करे। मेरी कोई बेटी नहीं है, इसलिए कृपया अपनी किसी बेटी का विवाह उससे कर दें।”

नया पत्र लेकर वह किसान के ससुर के घर पहुँचा।

ससुर ने पत्र पढ़कर आश्चर्य से पूछा, “क्या तुम्हें पता है कि इसमें क्या लिखा है?”

उसने कहा, “नहीं। किसान ने मुझे कुछ नहीं बताया। मैं तो एक गरीब ग्वाला हूँ और पढ़ना भी नहीं जानता।”

यह सुनकर ससुर का संदेह दूर हो गया।

उसका विवाह किसान की एक बेटी से तय कर दिया गया और शीघ्र ही विवाह हो गया। व्यापारी का बेटा अपनी पत्नी के परिवार के साथ रहने लगा।

कुछ समय बाद किसान को पता चला कि उसके साथ क्या हुआ था।

उसे समझ आ गया कि व्यापारी का बेटा हर बार अपनी बुद्धि से उसे मात दे रहा था। उसे डर हुआ कि कहीं अंत में उसकी अपनी उँगली ही न काटनी पड़े।

इस डर से किसान अपना घर छोड़कर भाग गया और फिर कभी वापस नहीं आया।

जब व्यापारी के बेटे को यह खबर मिली तो वह अपने पुराने मित्र राजकुमार से मिलने गया।

उसने राजकुमार से पूछा, “अब बताओ, बुद्धि अच्छी है या धन?”

फिर उसने कहा, “अपनी बुद्धि से मैंने उस किसान को बार-बार मात दी। उसने मुझे इतना चावल दिया कि मैं खा भी नहीं सकता था। मैंने उसका बैल मार दिया, उसका घर जला दिया और बिना एक पैसा खर्च किए विवाह भी कर लिया।”

“और तुमने अपने घर से जो धन लाया था, वह सब खर्च कर दिया। तुम्हें केवल भूख और परेशानी मिली। बताओ, तुम्हारे धन ने तुम्हारा क्या भला किया?”

राजकुमार के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था।

दो-तीन दिन बाद राजकुमार ने कहा, “अब हमें अपने माता-पिता के पास वापस चलना चाहिए।”

उसका मित्र सहमत हो गया, लेकिन उसने कहा कि पहले उसे अपनी पत्नी के परिवार को सूचना देनी होगी।

वे उस गाँव में लौटे जहाँ व्यापारी के बेटे का विवाह हुआ था।

वहीं रहते हुए राजकुमार की नजर एक राजा की बेटी पर पड़ी और वह उससे बहुत प्रेम करने लगा।

जब व्यापारी के बेटे को राजकुमार के प्रेम के बारे में पता चला तो उसने विवाह करवाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।

उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह राजा की बेटी के पास जाए और उसके सामने केवल राजकुमार के गुणों और उसकी अच्छाइयों की प्रशंसा करे।

उसकी बातों का असर हुआ। राजकुमारी राजकुमार के प्रति आकर्षित हो गई।

एक दिन जब उसकी मुलाकात राजकुमार से हुई तो वह भी उससे प्रेम करने लगी और उसे विश्वास हो गया कि वह राजकुमार से विवाह किए बिना खुश नहीं रह सकती।

अंततः दोनों का विवाह हो गया।

इसके बाद राजकुमार और व्यापारी का बेटा अपनी-अपनी पत्नियों के साथ अपने-अपने पिता के घर लौट गए।

इस प्रकार बुद्धिमान व्यापारी के बेटे ने सिद्ध कर दिया कि कठिन परिस्थितियों में धन से कहीं अधिक शक्तिशाली बुद्धि होती है।


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