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नमक जितना प्यार


बहुत समय पहले की बात है। एक राजा रहता था और उसकी तीन बेटियाँ थीं। एक दिन राजा ने सोचा कि वह जानना चाहता है कि उसकी तीनों बेटियों में से कौन उससे सबसे अधिक प्रेम करती है।

उसने अपनी तीनों बेटियों को बुलाया और पूछा, “मेरी प्यारी बेटियों, तुममें से प्रत्येक मुझसे कितना प्रेम करती है?”

सबसे बड़ी बेटी ने कहा, “पिताजी, मैं आपसे उतना ही प्रेम करती हूँ जितना सोने से करती हूँ!”

यह सुनकर राजा बहुत खुश हुआ।

दूसरी बेटी ने कहा, “पिताजी, मैं आपसे उतना ही प्रेम करती हूँ जितना हीरों से करती हूँ!”

यह सुनकर राजा और भी अधिक खुश हुआ।

लेकिन सबसे छोटी बेटी ने सरलता से कहा, “पिताजी, मैं आपसे उतना ही प्रेम करती हूँ जितना नमक से करती हूँ।”

यह सुनते ही राजा बहुत क्रोधित हो गया।

वह चिल्लाया, “तुम ऐसा कैसे कह सकती हो? तुम्हारी नजर में मेरी कीमत केवल साधारण नमक जितनी है?”

राजा को अपनी बेटी की बात से इतना अपमान और क्रोध महसूस हुआ कि उसने अपनी सबसे छोटी बेटी को राज्य से निकालकर जंगल में भेज दिया।

दुखी और निराश राजकुमारी जंगल में भटकने लगी। तभी उसे घोड़े के दौड़ने की आवाज सुनाई दी। डरकर वह एक पेड़ के खोखले तने के पीछे छिप गई।

घोड़ा पेड़ के पास आकर रुक गया और उस पर सवार एक युवक नीचे उतरा। उसने राजकुमारी को पेड़ के पीछे छिपते हुए देख लिया था।

जैसे ही दोनों की नजरें मिलीं, उन्हें एक-दूसरे से प्रेम हो गया।

युवक ने कहा, “मैं एक व्यापारी हूँ और पड़ोसी राज्य में रहता हूँ। तुम इस घने जंगल में अकेली क्या कर रही हो?”

राजकुमारी ने उसे अपनी पूरी दुखभरी कहानी सुनाई।

वह रोते हुए बोली, “मैं अपने पिता से बहुत प्रेम करती हूँ, लेकिन वे मेरी बात समझ नहीं पाए!”

व्यापारी ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, “एक दिन वे जरूर समझेंगे।”

कुछ समय बाद दोनों का विवाह हो गया और सबसे छोटी राजकुमारी अपने व्यापारी पति के साथ एक सुंदर महलनुमा घर में रहने लगी।

एक दिन ऐसा हुआ कि राजा शिकार करते समय रास्ता भटक गया। वह लगातार दो दिनों तक जंगल में भटकता रहा।

आखिरकार वह व्यापारी के घर तक पहुँच गया।

भूखा और थका हुआ राजा व्यापारी के पास गया और उससे सहायता माँगी।

व्यापारी जानता था कि यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि उसका ससुर, वही राजा है। लेकिन उसने इस बात को जाहिर नहीं किया।

उसने कहा, “महाराज, मैं आपके लिए भोजन की व्यवस्था करता हूँ।”

फिर वह अपनी पत्नी, राजकुमारी, के पास गया। उसने उसे राजा के आने की बात बताई और एक शानदार भोज तैयार करने को कहा।

फिर उसने धीरे से कहा, “लेकिन ध्यान रखना, सारे व्यंजन मीठे होने चाहिए और किसी भी व्यंजन में एक दाना भी नमक नहीं डाला जाना चाहिए।”

राजकुमारी तुरंत समझ गई कि उसके पति का क्या मतलब है।

वह रसोई में गई और तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करवाने लगी—स्वादिष्ट मांस, सुगंधित चावल, गर्म रोटियाँ और स्वादिष्ट सब्जियाँ। लेकिन किसी भी व्यंजन में नमक नहीं डाला गया।

भूखा-प्यासा राजा जब उस शानदार भोजन के सामने बैठा तो उसे बहुत राहत महसूस हुई।

लेकिन जैसे ही उसने पहला निवाला मुँह में रखा, उसे कुछ बहुत अजीब लगा।

हर व्यंजन फीका, बेस्वाद और निगलने में मुश्किल था।

उसने दूसरा व्यंजन चखा। फिर तीसरा।

लेकिन वह एक भी निवाला ठीक से नहीं खा पाया।

तभी राजकुमारी उसके सामने आई और अपनी पहचान बता दी।

राजा अपनी बेटी को देखकर स्तब्ध रह गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए।

अब उसे आखिरकार समझ में आ गया कि उसकी बेटी ने वर्षों पहले “नमक जितना प्यार” कहकर क्या समझाना चाहा था।

नमक दिखने में भले ही साधारण होता है। वह सोने की तरह चमकता नहीं और हीरों की तरह जगमगाता नहीं।

लेकिन नमक के बिना सबसे शानदार भोजन भी फीका और अधूरा होता है।

ठीक उसी तरह राजकुमारी का अपने पिता के प्रति प्रेम भी दिखावे से दूर था—शांत, सच्चा और बेहद जरूरी।

राजा ने अपनी बेटी को गले लगा लिया और उससे अपने व्यवहार के लिए क्षमा माँगी।

उस दिन के बाद राजा ने कभी भी प्रेम को बड़े-बड़े शब्दों या दिखावे से नहीं आँका।

उसने समझ लिया कि सच्चा प्रेम अक्सर शांत होता है, लेकिन उसकी मौजूदगी जीवन के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी भोजन के लिए नमक।


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